
Patient Education
Understand your condition. Prepare for treatment. Recover with confidence.
Clear, reliable guidance from Dr Vivek Gupta to help you recognise symptoms early, understand investigations, and follow safe recovery steps for GI, liver, pancreas and biliary conditions.
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Practical education for every stage of care

Education topics
Common GI & liver concerns explained
These summaries are for general awareness. Your diagnosis and treatment plan may differ based on your history, examination and investigations.
Fatty liver (NAFLD/MASLD)
Often silent early. Focus on weight management, diabetes control, limiting alcohol, and regular follow-up to prevent fibrosis.
Hepatitis & jaundice
पीलिया रोग (जॉन्डिस) के बारे में जानकारी। आइए हम लोग पीलिया रोग को समझते हैं। पीलिया अंग्रेजी भाषा में जॉन्डिस नाम से जाना जाता है। पीलिया की बिमारी बच्चों एवं वयस्कों में आम तौर से देखी जाती है। इस बिमारी का पता चलता है जब की मरीज की आंखें तथा चमड़ी का रंग पीला पीला सा लगने लगता है। इसके अलावा पेशाब बी हल्के या गाढ़े पीले रंग की होने लगती है। इसमें मल का रंग भी हल्का सफेद कुछ मरीजों में हो सकता है। आंखो में पीलापन आने से पहले कई बार मरीज को बुखार एवं कमजोरी की समस्या हो सकती है। इसके अलावा मरीज को पेट में दर्द अथवा भारीपन की शिकायत भी हो सकती है। पीलिया की बिमारी कुछ मामलों में एक आम बिमारी होती है जिसका कोई इलाज भी सहज होता है। परंतु कुछ मामलों में यह एक गंभीर बिमारी का सूचक होती है जिसमे की कैंसर भी शामिल है।
आइए अब हम पीलिया को और विस्तार में जानते हैं तथा उसके कुछ मुख्य कारणों को समझते हैं।।पीलिया शरीर में बिलिरूबिन की अधिक मात्रा से पैदा होता है। बिलीरूबिन लिवर के द्वारा उत्पाद किया हुआ एक पदार्थ है जो कि लिवर फंक्शन ठीक ना होने के कारण शरीर के अंदर जमा हो जाता है।पीलिया के दो मुख्य कारण है, एक मेडिकल कारण तथा दूसरे सर्जिकल कारण। मेडिकल कारणों में, मुख्य तौर से हेपेटाइटिस इन्फेक्शनआता है। हेपेटाइटिस इन्फेक्शन पांच तरह का होता है। इसमें हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई आते हैं। हेपेटाइटिस ए एवं ई आम तौर पर गंदा भोजन एवं पानी के सेवन से होते हैं। यह बिमारी ज्यादातर मानसून में आती है, तथा इससे कमजोरी, बुखार एवं पीलिया हो जाता है।यह बिमारी आमतौर से बच्चों में आती है तथा इस बिमारी में दवा से 15-20 दिन में आराम आ जाता है।लेकिन कुछ स्थितियों में जैसे कि बुजुर्ग लोगो में और खासकर गर्भवती महिलाओं में हेपेटाइटिस की बिमारी गंभीर रूप ले सकती है। हेपेटाइटिस ए के टीकाकरण से हेपेटाइटिस ए से बचा जा सकता है। इसके अलावा मॉनसून में खासतौर पे और साल के दूसरे दिनों में भी बाहर खाने पीने से बचें। यदि गर्भवती महिलाओं को हेपेटाइटिस हुआ है तो उसको तुरंत ही लिवर के स्पेशलिस्ट को दिखाएं जरूरत पड़ने पर बड़े शहर जाके।
हेपेटाइटिस बी, सी एवं डी किसी मरीज को इन्फेक्टेड ब्लड चलने से अथवा नीडल द्वारा ड्रग के सेवन से तथा संक्रमित व्यक्ति से सेक्शुअल रिलेशन से भी ट्रांसमिट हो सकता है। यह बिमारी माता द्वारा बच्चे में जन्म के समय भी ट्रांसमिट हो सकती है। यह बिमारी खाने से तथा मरीज की देखभाल से या हाथ लगाने से नहीं फैलती है। लंबे समय तक हेपेटाइटिस बी एवं सी वायरस रहने से लिवर सिरोसिस भी हो सकती है।
अच्छी बात यह है कि हेपेटाइटिस बी एवं सी हो जाने पर आजकल कारगर दवाइयां उपलब्ध है। यह दवाई एक हिपेटोलॉजीस्ट या लिवर स्पेशलिस्ट शुरू कर सकता है।इसके अलावा हेपेटाइटिस बी से बचने के लिए टीका मौजूद है। टीके के कारण हेपेटाइटिस बी के मामले अब कम हो रहे हैं। हेपेटाइटिस बी सी एवं डी से बचाव के लिए हमेशा रजिस्टर्ड ब्लड बैंक से ही ब्लड लें तथा।सुई का प्रयोग हमेशा स्टेरिलाइज्ड एवं पैक सुई का ही करें।
आइए अब हम लिवर सिरोसिस के बारे में जानते हैं। सिरोसिस एक गंभीर बिमारी है। सिरोसिस लिवर के अत्यधिक डैमेज होने के कारण होती है। लिवर डैमेज होने के कई कारण हो सकते हैं। इसमें मुख्य तरीके से अत्यधिक शराब का सेवन तथा हेपेटाइटिस बी एवं सी का इन्फेक्शन तथा अत्यधिक डाइअबीटीज़ या मोटापा कारण है। बच्चों में कई जन्मजात बिमारी जैसे कि बिलियरी एट्रेसिया, विल्सन्स डिजीज आदि से लिवर जनम से भी खराब हो सकता है परंतु इसकी संभावना कुछ लाखों जनम में भी एक ही होती है। लिवर सिरोसिस होने पे, मरीज को पीलिया, खून की उल्टी तथा पेट में पानी आने जैसी परेशानियां होती हैं।सिरोसिस में लिवर में कैंसर बनने की भी संभावना रहती है।सिरोसिस एडवान्स हो जाने के उसके उपचार के लिए आपको डॉक्टर लिवर ट्रांसप्लांट के लिए एडवाइस कर सकते हैं।इस समय लिवर ट्रांसप्लांट की सक्सेस रेट 80-90 प्रतिशत होने के कारण यह एक कारगर उपाय है।
अब हम पीलिया के सर्जिकल कारणों के बारे में जानते हैं। पित की थैली के पत्थर (गॉलस्टोन) के बारे में सभी को पता है । कभी कभी यह पत्थर पित्त की नली में फिसल जाने के कारण भी पीलिया हो सकता है। यह पत्थर अल्ट्रासाउंड अथवा ‘एमआरसीपी’ मैं पता चल जाता है। इस का इलाज सहज होता है, यह पत्थर एंडोस्कोपी के द्वारा अथवा ऑपरेशन के द्वारा भी निकाला जा सकता है तथा पत्थर निकालने पे पीलिया से आराम आ जाता है।
पीलिया कैंसर सूचक भी हो सकता है। पीलिया के साथ अगर मरीज के वजन में बहुत कमी आ गई है, अथवा पेट में दर्द हो रहा है तथा कमजोरी लग रही है तो ये कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। मुख्यतः पित की थैली का कैंसर, पैनक्रिअस कैन्सर के कारण गांठ बनने से पित की नली में दबाव बन जाता है।तथा बिलीरूबिन लिवर से आतो (इन्टेंस्टाइन) में नहीं पहुँच पाता, इस कारण पीलिया हो जाता है। पीलिया होने का मतलब है की कैंसर की गांठ बढ़ी हुई है।
गॉल ब्लैडर कैंसर की बिमारी ज़्यादातर गैंगेटिक प्लेन में अत्यधिक मात्रा में देखी जा रही है।इस बिमारी में गॉलस्टोन के मुकाबले मरीज की स्थिति ज्यादा खराब रहती है तथा अल्ट्रासाउंड में गांठ भी दिखती है।यदि पित की थैली में पत्थर के अलावा गांठ दिखती है या फिर थैली में सूजन दिखती है तो सीटी स्कैन करा के उस कैंसर के बारे में और जानकारी ली जा सकती है। यदि मरीज को पेट में दर्द के साथ पीलिया हो, तो उसको नजर अंदाज ना करें तथा समय रहते उसकी सही तरीके से जांच कराएं और यदि कैंसर का शक हो तो बिना किसी देरी के सीटी स्कैन करा के उसको डायग्नोसिस कराएं। कई बार ज्यादा देर होने से कैंसर का इलाज संभव नहीं हो पाता है। इसका ऑपरेशन भी बड़ा होता है। यदि, ऑपरेशन ना हो पाए तो फिर कीमोथेरेपी का ऑप्शन रहता है। कीमोथेरेपी से पहले पीलिया कम करने के लिए पित्त की नली में एंडोस्कोपी द्वारा या फिर अल्ट्रासाउंड द्वारा स्टेंट डालना पड़ सकता है। इससे पीलिया कम होता है तथा पीलिया में कभी कभी जो मरीज को खुजली होती है उससे भी आराम आता है। इस कैंसर का इलाज एक स्पेशलिस्ट सेंटर में ही कराएं।तथा डॉक्टर के दी हुई अडवाइस को फॉलो करें।
डॉक्टर विवेक गुप्ता
लिवर ट्रांसप्लांट एवं गैस्ट्रो सर्जन
लखनऊ. Email vgkgmu@gmail.com
Cirrhosis & Liver Transplant
लिवर ट्रांसप्लांट /मेदांता, लखनऊ /डॉ विवेक गुप्ता
लिवर ट्रांसप्लांट को तकनीकी रूप से कठिन सर्जरी माना जाता है। लिवर सर्जनों को विशेष तकनीकों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। लिवर ट्रांसप्लांट से पहले मरीज के कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं, जिनमें ऑपरेशन के लिए फिटनेस का टेस्ट भी होता है। लिवर ट्रांसप्लांट ऑपरेशन में मरीज के क्षतिग्रस्त लिवर को निकालकर नया लिवर प्रत्यारोपित किया जाता है।
मेदांता हॉस्पिटल, लखनऊ में नियमित रूप से किया जा रहा है लीवर ट्रांसप्लांट। मेदांता में लीवर ट्रांसप्लांट टीम अत्यधिक अनुभवी है। मेदांता टीम में 100 से अधिक डॉक्टर शामिल हैं। कुल मिलाकर मेदांता टीम को 4000 से अधिक ट्रांसप्लांट का अनुभव है।
नया लिवर डोनर से प्राप्त होता है I अधिकतर रूप से यह मरीज के निकटतम संबंधियों द्वारा ही दिया जाता है जैसे कि पति पत्नी भाई बहन या बच्चों या माता-पिता I ज्यादातर इसमें मैं नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा ही लिवर डोनेशन लिया जाता हैI लिवर डोनेशन सर्जरी में लिवर का करीब 50 to 60% परसेंट हिस्सा निकाल दिया जाता है I डोनर का लीवर करीब 3 महीने में वापस बढ़ जाता है I
डोनेशन से पहले डोनर के कई तरह के टेस्ट होते हैं जिसमें कि डोनर की जनरल ब्लड टेस्ट जनरल फिजिकल टेस्ट तथा लीवर की अंदरूनी संरचना की जानकारी ली जाती है I इसमें सीटी स्कैन करा जाता है ताकि यह देखा जा सके कि लिवर को सही तरीके से विभाजित किया जा सकता है कि नहीं I डोनर का ब्लड ग्रुप मरीज के लीवर से मैचिंग होना चाहिए या फिर O ब्लड ग्रुप होना चाहिए का होना चाहिए I डोनेशन के लिए कमेटी द्वारा डोनेशन के लिए डोनर को सरकार या अस्पताल द्वारा बनाई हुई कमेटी से अप्रूव किया जाता है I ऑपरेशन करीब 8 घंटे का होता है तथा डोनर को अस्पताल में करीब 5 दिन पड़ता है रहना पड़ता है I डोनेशन की प्रक्रिया में जोखिम 1% से भी कम है तथा कुछ कॉम्प्लिकेशन होने का चांस भी बहुत कम रहता है I कुछ दिनों तक मामूली तकलीफ रह सकती है I करीब 3 महीने में डोनर का लिवर वापस बड़ा हो जाता हैI लिवर डोनेशन के बाद करीब 1 से 3 महीने में मरीज पूरी तरह से स्वस्थ महसूस करता है तथा डोनर को कोई लंबे समय तक दवाई नहीं चलती है I
लिवर ट्रांसप्लांट ऑपरेशन करीब 12 घंटे चलता है I इसमें मरीज का खराब लिवर पूरी तरह से निकाल दिया जाता है तथा नए लीवर को उसके स्थान पर लगा दिया जाता है I इसमें लिवर में आने वाली खून की सप्लाई की नालियों को जोड़ा जाता है पित्त की नली को जोड़ा जाता है एवं लीवर से खून की सप्लाई वापस ले जाने वाली धमनियों को हॉट से जोड़ा जाता है I लिवर ट्रांसप्लांट एक बहुत बड़ा ऑपरेशन है इसका सक्सेस रेट करीब 90-95% है I लिवर ट्रांसप्लांट के बाद कॉन्प्लिकेशन हो सकते हैं जैसे कि रिजेक्शन, इंफेक्शन, ब्लीडिंग, पित्त का स्राव हर्निया आदि, जो की ज्यादतर केस में डॉक्टर कंट्रोल कर लेते हैं I ट्रांसप्लांट के बाद करीब 5 दिन आईसीयू में रखा जाता है तथा करीब 12 से 15 दिन के अस्पताल में रखा जाता है Iमरीज को ऑपरेशन के बाद कई तरह की सावधानियां बरतनी होती है जैसे कि खानपान का विशेष ध्यान रखना तथा भीड़ से बचना इसके अलावा मरीज के रेगुलर बेस पर टेस्ट कराए जाते हैं जाते हैं मरीज को रिजेक्शन व इंफेक्शन से बचाने के लिए दवाइयां दी जाती हैं I यह दवाइयां शुरुआत में ज्यादा होती है धीरे-धीरे कम की जाती है पर कुछ ताउम्र चलती हैI दवाइयों के अलावा मरीज की जनरल सेहत का भी ध्यान रखना पड़ता है जैसे कि ब्लड प्रेशर एवं शुगर को कंट्रोल रखना तथा नियमित व्यायाम करनाI मरीज को एक नई जिंदगी मिल सकती है तथा उसका लीवर नया लेकर कई सालों तक बढ़िया काम कर सकता है मरीज अपनी पूरी जिंदगी जी सकता है I
Pancreatitis & pancreatic cysts
Severe abdominal pain needs urgent care. Treatment depends on cause (stones, alcohol, triglycerides) and may require endoscopic or surgical management.